मोदी सरकार के तहत अल्पसंख्यकों, दलितों और महिलाओं के खिलाफ भीड़ द्वारा हत्याओं और घृणा अपराधों में भारी वृद्धि हुई है और उन्हें सामान्य बना दिया गया है, क्योंकि दंडमुक्ति, राज्य की मिलीभगत, अपराधियों का महिमामंडन और घृणास्पद भाषणों पर न्यायिक निष्क्रियता ने भारत को फासीवाद के एक रूप की ओर धकेल दिया है
“भीड़ अत्याचारियों की जननी है”
– डायोजनीज Diogenes ( मृत्यु 328 ईसा पूर्व)
फारोस मीडिया द्वारा प्रकाशित ज़फ़र-उल-इस्लाम द्वारा सम्पादित पुस्तक मॉब लिंचिंग इन इंडिया – ए रिकॉर्ड Record 2014-2024 (भारत में भीड़ द्वारा हत्या – एक अभिलेख – 2014-24’) के ‘परिचय’ शीर्षक वाले अध्याय में भीड़ द्वारा हत्या के जरिए निर्दोष लोगों की लक्षित हत्याओं की पृष्ठभूमि समझाई गई है और फिर केंद्र में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने तथा ‘घृणा अपराधों और गायों की निगरानी के नाम पर हिंसा की घटनाओं’ में उछाल के बीच संबंध बताया गया है, जिसके बाद विभिन्न हिंदुत्ववादी संगठनों और संघ परिवार से संबद्ध संगठनों के बढ़ते हुए तूफानी दस्तों ने ‘मुसलमानों, ईसाइयों, दलितों के साथ-साथ महिलाओं का जीवन दयनीय’ बना दिया है।
इसमें आगे कहा गया है, ‘मोदी सरकार भारत के धार्मिक अल्पसंख्यकों को हाशिये पर धकेलने के लिए सब कुछ कर रही है’। (पृ. 18) भारत में हिंसा के कारणों पर चर्चा करने के बाद, यह आगे ‘भारत में भीड़ की हिंसा के कुछ प्रमुख कारणों’ का विस्तार से वर्णन करती है, जिनमें दहेज हत्याएँ, सांप्रदायिक दंगे, मानव बलि और डायन बताकर हत्याएँ शामिल हैं।
डायन बताकर की जाने वाली हत्याओं के बारे में लेखक द्वारा प्रस्तुत आँकड़े वास्तव में विचलित करने वाले हैं: राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार, 2005-2015 के बीच भारत में जादू-टोना करने के आरोपों के बाद 2,000 से अधिक महिलाओं की हत्या कर दी गई ( पृ. 20)।
इसमें कोई संदेह नहीं कि ये आधिकारिक आँकड़े हैं और वास्तविक संख्या इससे अधिक होगी। हालाँकि डायन बताकर हत्या करना – जो ‘हर मायने में भीड़ द्वारा हत्या है’ (पृ. 19) – 12 राज्यों में प्रचलित है, लेकिन केवल सात राज्यों में इस प्रथा को अपराध घोषित करने वाले कानून हैं।
भीड़ को क्या भड़काता है?
इसमें आगे ‘भीड़ की हिंसा के प्रमुख कारणों‘ पर विस्तार से चर्चा की गई है और ‘अल्पसंख्यकों को निशाना बनाकर प्रताड़ित करने’ (पृ. 21) को भी इसमें शामिल किया गया है। इसमें कहा गया है कि वर्तमान भाजपा सरकार के तहत ‘भीड़ द्वारा हत्या ‘ने एक नया अर्थ और स्वीकार्यता हासिल कर ली है‘, जहाँ राज्य ‘हत्यारी भीड़ के सामने आत्मसमर्पण कर देता है‘, और ऐसी ‘विश्वसनीय रिपोर्टों‘ का हवाला दिया गया है जो संकेत देती हैं कि युवा हिंदू पुरुषों और महिलाओं को मुसलमानों को जहाँ भी और जब भी संभव हो निशाना बनाने के लिए हथियार चलाने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
इसमें ‘चरमपंथी हिंदू नेताओं के विवादास्पद बयानों‘ का भी उल्लेख है, जो अपने अनुयायियों से ‘धार्मिक और सामाजिक अल्पसंख्यकों को मारने का आह्वान करते हैं और उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाती’ (पृ. 21)। इसके बाद यह स्वतंत्रता के बाद के भारत में ऐसी लक्षित हत्याओं के इतिहास को दर्ज करता है, विभाजन के दंगों और सिख-विरोधी दंगों (1984) से लेकर ऑस्ट्रेलियाई ईसाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स और उनके दो बेटों, फिलिप (10 वर्ष) और टिमोथी (6 वर्ष) को बजरंग दल की हिंदू मिलिशिया द्वारा 23 जनवरी 1999 को उनकी स्टेशन वैगन में सोते समय जिंदा जला दिए जाने तक।
इसमें अलग-अलग मामलों की भी जाँच की गई है। इनमें ईसाई अनाथालय की हिंदू निवासी राजिनी की हत्या (पृ. 23) और उज्जैन में राजनीति विज्ञान विभाग के प्रमुख प्रो. एचएस सभरवाल की कथित तौर पर आरएसएस के छात्र संगठन एबीवीपी के सदस्यों द्वारा की गई हत्या (26 अगस्त 2006) शामिल हैं; उनके हमलावरों को ‘सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया’ (पृ. 24)।
अन्य मामलों में हरियाणा के झज्जर में गायों को मारने के संदेह में पाँच दलितों की भीड़ द्वारा हत्या (2002) शामिल है। इसमें हमलावरों की बढ़ती बेखौफी को रेखांकित किया गया है, जो अपने अपराधों के वीडियो बनाते हैं और उन्हें सोशल मीडिया पर प्रसारित करते हैं, क्योंकि ‘मानवता के खिलाफ इन अपराधों में शामिल लोगों को लगभग कभी सजा नहीं दी गई है‘ (पृ. 25)।
ऐसे वीडियो रिकॉर्ड करने और अपलोड करने वाले विशेषज्ञों के अनुसार, यह निश्चित रूप से संकेत देता है कि “राज्य और नागरिक समाज के भीड़ वाले तत्वों के बीच किसी तरह की सिम्फनी / तालमेल है।” (पृ. 25)
जर्मनी के मैक्स प्लांक संस्थान में वरिष्ठ शोध अध्येता प्रो. इरफान अहमद बताते हैं: “ये वीडियो पीड़ितों के साथ-साथ अपराधियों के लिए भी संदेश का काम करते हैं। एक एकीकृत समुदाय के रूप में मुसलमानों के लिए संदेश है कि अपने तौर-तरीके सुधारो और वैसा व्यवहार करो जैसा हम तुम्हें बताते हैं। एक एकीकृत समुदाय के रूप में हिंदुओं के लिए संदेश है कि देखो, हमने अपने समुदाय के लिए क्या किया।’
किताब में आगे विस्तार से बताया गया है कि ऐसी हत्याओं में शामिल अपराधियों और दोषियों का किस तरह महिमामंडन किया जाता है और उन्हें नायक बनाया जाता है, जो ‘भारतीय समाज में घर कर चुकी एक चिंताजनक प्रवृत्ति है’ (पृ. 26) और इस बात को स्पष्ट करने के लिए दो मामलों पर चर्चा की गयी है।
दिसंबर 2017 में, शंभूलाल रेगर ने राजसमंद (राजस्थान) में मुस्लिम मजदूर अफराजुल खान को कुल्हाड़ी से काटकर मार डाला और बाद में उसे जला दिया। रेगर ने कहा कि उसने खान की हत्या ‘लव जिहाद’ की एक घटना को रोकने के लिए की, जिसमें कोई मुस्लिम पुरुष किसी हिंदू महिला को बहला-फुसलाकर अपने प्रेमजाल में फँसा सकता था। इस क्रूर कृत्य का वीडियो बनाया गया। यह राजसमंद के आसपास के व्हाट्सऐप समूहों में प्रसारित हुआ। फिर यह पूरे देश में फैल गया।
इस कृत्य की सभी को निंदा करनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सैकड़ों लोग – जिनमें से कई बजरंग दल से जुड़े थे – रेगर को नायक के रूप में सराहने के लिए सड़कों पर उतर आए। जोधपुर में रामनवमी समारोहों के दौरान, उसे एक झाँकी के जरिए सम्मानित किया गया, जिसमें वह हाथ में गैंती लिए सिंहासन जैसी कुर्सी पर बैठा है। झाँकी के ऊपर लगे बैनर पर लिखा है, ‘हिंदू भाइयों, अपनी बहनों और बेटियों की रक्षा करो और देश को लव जिहाद से मुक्त कराओ’।
जयपुर की कमल दीदी, जिन्होंने हयात रब्बानी होटल पर हमले का नेतृत्व किया था, ने हरियाणा के मुस्लिम डेयरी किसान पहलू खान के कथित हत्यारों की तुलना भगत सिंह, सुखदेव और चंद्रशेखर आज़ाद से की। यह घृणित झूठी समानता भारत के राष्ट्रीय नायकों की स्मृति का अपमान है। जब कथित हत्यारों में से एक – विपिन यादव – साध्वी कमल दीदी से मिला, तो उन्होंने उससे कहा, ‘पूरा देश तुम्हारे साथ है’। ये हिंदुत्व के कट्टरपंथियों के नायक हैं।/
इसमें कोई संदेह नहीं कि निर्दोष लोगों के खिलाफ हिंसा को सामान्य बना देना और उनके हत्यारों का महिमामंडन करना हमारे समाजों की नैतिक दिशा पर गंभीर सवाल खड़े करता है। शायद यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि दार्शनिक हन्ना अरेंट ने एडोल्फ आइखमैन के बारे में क्या लिखा था, जो वह नाज़ी था जिसने होलोकॉस्ट का आयोजन किया था:
आइखमैन के साथ समस्या ठीक यही थी कि उसके जैसे बहुत से लोग थे, और उनमें से अधिकांश न तो विकृत मानसिकता वाले थे और न ही परपीड़क, बल्कि वे ऐसे लोग थे, जो तब भी और आज भी, भयावह और आतंकित कर देने वाले ढंग से सामान्य थे। हमारी कानूनी संस्थाओं और नैतिक निर्णय के मानकों के दृष्टिकोण से, यह सामान्यता सभी अत्याचारों को एक साथ जोड़ देने से भी कहीं अधिक भयावह थी।‘ (Eichmann in Jerusalem – A Report on the Banality of Evil)
क्या हम फासीवाद के पाँचवें चरण में प्रवेश कर रहे हैं?
अध्याय ‘लिंचिंग: भारत में सामान्य होती हिंसा’ की शुरुआत फासीवाद के पाँच चरणों के चक्र की पड़ताल से होती है:
रॉबर्ट पैक्सटन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द एनाटॉमी ऑफ फासीज़्म’में फासीवाद का पाँच चरणों में अध्ययन करने का प्रस्ताव रखा है: 1. एक आंदोलन का निर्माण, 2. राजनीतिक व्यवस्था में उसकी जड़ें जमना, 3. सत्ता पर उसका कब्ज़ा, 4. सत्ता का इस्तेमाल और 5. अंततः वह लंबा दौर, जिसके दौरान फासीवादी शासन या तो कट्टरपंथीकरण की दिशा में आगे बढ़ता है या फिर जड़ता और क्षरण का शिकार होता है। (पृष्ठ 37)
इसके बाद यह सवाल उठाया गया है कि मई 2014 में मोदी के सत्ता में आने के बाद से जिस तरह की हिंसा का सिलसिला शुरू हुआ है, उसके मद्देनज़र, “क्या अब यह पूछने का समय आ गया है कि हम फासीवाद के पाँचवें चरण में प्रवेश कर चुके हैं?” (वही)
आगे अध्याय में प्राचीन भारत में गोमांस खाने के इतिहास पर चर्चा की गई है। इसमें बताया गया है कि संविधान सभा में ‘गाय’ का मुद्दा किस तरह उठा और उस पर किस प्रकार यह सहमति बनी कि “गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने वाला कोई राष्ट्रीय कानून नहीं बनाया जाना चाहिए; इसके बजाय, इसे राज्य के नीति– निर्देशक सिद्धांतों में शामिल किया गया, जो बाध्यकारी नहीं हैं।” (पृष्ठ 38) इसमें यह भी बताया गया है कि 1958 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में किस तरह टालमटोल की।
चूँकि गोहत्या का मुद्दा आज भी प्रासंगिक और विवादास्पद बना हुआ है, इसलिए शायद यह याद करना ज़रूरी है कि महात्मा गांधी ने इस बारे में क्या कहा था और डॉ. आंबेडकर का इस मुद्दे को लेकर क्या दृष्टिकोण था।
भारत के औपचारिक रूप से स्वतंत्र होने से पहले, 25 जुलाई 1947 को गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने के सवाल पर गांधी ने कहा था:
“हिंदू धर्म ने हिंदुओं के लिए गोहत्या को निषिद्ध किया है, पूरी दुनिया के लिए नहीं। यह धार्मिक निषेध भीतर से आया था। बाहर से थोपी गई कोई भी पाबंदी बाध्यता बन जाती। ऐसी बाध्यता धर्म के प्रतिकूल थी।” (पृष्ठ 39)
वंचितों के महान नेता डॉ. आंबेडकर ने अपने महत्त्वपूर्ण लेख ‘अस्पृश्यता, मरी हुई गाय और ब्राह्मण’ में रेखांकित किया था कि गोमांस खाना अस्पृश्यता के कलंक के केंद्र में था। उनके लेखन से यह समझने में मदद मिलती है कि प्राचीन भारत में गोमांस के प्रश्न को किस नज़र से देखा जाता था।
आज की स्थिति यह है कि भाजपा-शासित कुछ राज्यों—मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और हरियाणा—ने गोवंश से जुड़े कानूनों को और सख़्त कर दिया है। ऐसी अनेक घटनाएँ सामने आई हैं जिनमें इन कानूनों ने गोहत्या का विरोध करने के नाम पर स्वयंभू निगरानी समूहों और कानून अपने हाथ में लेने वालों को बढ़ावा दिया है। उदाहरण के लिए, मध्य प्रदेश सरकार द्वारा बनाए गए कानून में कहा गया है:
“सक्षम प्राधिकारी द्वारा अधिकृत किसी भी व्यक्ति को ऐसे किसी भी परिसर में प्रवेश करने, उसका निरीक्षण करने और तलाशी लेने का अधिकार होगा, जहाँ उसे यह विश्वास करने का कारण हो कि कोई अपराध किया गया है या किए जाने की संभावना है, और वह कोई भी कार्रवाई कर सकता है।” (पृष्ठ 41)
इस कानून की भाषा से स्पष्ट है कि इसने निजी निगरानी समूहों को खुली छूट दे दी है। ये समूह ‘गौ रक्षक’ होने का दावा करते हुए मारपीट, लूटपाट और हत्या जैसे जघन्य अपराधों में शामिल हो रहे हैं। (पृष्ठ 41)
इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि पहलू खान, नासिर खान, रकबर खान, जुनैद और उमर जैसे लिंचिंग के पीड़ितों की विधवाओं ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने वाले कानूनों को ‘अवैध’ घोषित करने अथवा उनमें संशोधन कर गोहत्या की अनुमति देने की माँग की थी। उनका तर्क था कि ये कानून अराजकता को बढ़ावा दे रहे हैं और कुछ लोगों को कानून अपने हाथ में लेने की छूट दे रहे हैं।
लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया और उन्हें उच्च न्यायालय जाने को कहा। ऐसा तब हुआ, जब याचिकाकर्ताओं के वकील कपिल सिब्बल ने इस बात पर ज़ोर दिया था कि “यह मुद्दा किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि एक राष्ट्रीय समस्या है।” (पृष्ठ 42)
निर्दोष लोगों की इस तरह निशाना बनाकर की जाने वाली हत्याओं—विशेषकर सामाजिक और धार्मिक अल्पसंख्यकों से जुड़े लोगों की हत्याओं—और सरकार द्वारा इन्हें होने देने के रवैये पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी ध्यान दिया है। घृणा-अपराधों में शामिल हिंदुत्ववादी हमलावरों, उनकी रक्षा करती पुलिस और उन्हें गले लगाकर माला पहनाने वाले मंत्रियों की व्यापक स्तर पर देश और विदेश में आलोचना हुई है। इस स्थिति ने कुछ टिप्पणीकारों को यह निष्कर्ष निकालने के लिए प्रेरित किया कि भारत में “भीड़तंत्र के आगे घुटने टेके जा रहे हैं।”
जब ऐसी हत्याओं से विदेशों में भारत की छवि धूमिल हुई, तो मुख्यधारा के भारतीय अख़बारों को भी—जो एक दशक से अधिक समय से सत्तारूढ़ व्यवस्था की प्रशंसा करते रहे हैं—लिंचिंग की इस परिघटना पर कड़े संपादकीय लिखने पड़े।
यह अध्याय इस बार-बार दोहराए जाने वाले दावे का भी खंडन करता है कि ऐसी लक्षित हत्याओं में शामिल अपराधी महज़ ‘हाशिये के तत्व’ होते हैं। इसमें दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाने वाले प्रोफेसर अपूर्वानंद का हवाला दिया गया है, जो वर्चस्ववादी ताकतों को बेनकाब करने से कभी नहीं हिचकते। उनके अनुसार, “हिंसक हमलों का यह सिलसिला किसी भी तरह से भीड़ के गुस्से की स्वतःस्फूर्त अभिव्यक्ति नहीं है। यह हिंदू राष्ट्रवादियों द्वारा हिंसा के लिए व्यवस्थित रूप से उकसाए जाने का परिणाम है।” (पृष्ठ 44)
घृणास्पद भाषण और दंडमुक्ति
हम इस सच्चाई को स्वीकार करना चाहें या नहीं, लेकिन एक सवाल उठाया जाना ज़रूरी है: क्या भारत अब अंततः एक “लिंचिस्तान” में तब्दील हो चुका है? (पृष्ठ 47)
“स्थिति की गंभीरता के बावजूद, इस पर भारतीय राज्य की प्रतिक्रिया बिल्कुल भी उत्साहजनक नहीं दिखती।” वर्ष 2023 तक भी लिंचिंग और भीड़ की हिंसा से निपटने के लिए कोई विशेष कानून बनाना आवश्यक नहीं समझा गया। इसके बाद भारतीय न्याय संहिता में एक कमज़ोर प्रावधान शामिल किया गया। (पृष्ठ 71)
इसके साथ यह तथ्य भी जुड़ा है कि:
“2019 और 2024 के चुनावों के दौरान लिंचिंग राजनीतिक दलों के लिए कोई मुद्दा नहीं बनी। केवल कुछ प्रभावित राज्यों ने ऐसे कानून बनाए, जो उन राज्यों की सीमाओं के भीतर ही लागू हो सकते थे; लेकिन केंद्र सरकार ने उन्हें भी प्रभावी ढंग से लागू नहीं होने दिया।” (पृष्ठ 71)
इस अध्याय का समापन इस महत्त्वपूर्ण पुस्तक से जुड़े संपादकों और शोधकर्ताओं द्वारा किए गए शोध के निष्कर्षों के साथ होता है। इसमें “घृणा–अपराधों के पीड़ितों के लिए आपराधिक न्याय प्रणाली के कामकाज में गंभीर खामियों” की ओर ध्यान दिलाया गया है।
आपराधिक न्याय प्रणाली के खराब कामकाज के कारण घृणा-अपराधों, लिंचिंग और स्वयंभू निगरानी समूहों की हिंसा के मामलों में राज्य तथा निजी व्यक्तियों को मिलने वाली दंडमुक्ति यह सुनिश्चित करती है कि घृणा से प्रेरित हिंसा जारी रहे। न्याय पाने की कोशिश में पीड़ितों की गरीबी, अशिक्षा और सामाजिक वंचना भी उनकी स्थिति को और कठिन बना देती है। वे इतने गरीब, अनजान, असहाय और हतोत्साहित होते हैं कि लंबे समय तक चलने वाले कानूनी मुकदमों को मज़बूती से आगे नहीं बढ़ा पाते।
पुलिस की लंबी और जटिल प्रक्रियाएँ, पारदर्शिता का अभाव तथा अदालतों में होने वाली अत्यधिक देरी का अर्थ यह है कि केवल वही लोग अंत तक न्याय पाने की लड़ाई लड़ पाते हैं, जिनके पास इसके लिए पर्याप्त संसाधन और दृढ़ संकल्प होता है। लिंचिंग में मारे गए लोगों के परिवारों में शायद ही किसी के पास ये दोनों चीज़ें होती हैं।
“जब हम इस लेख को प्रकाशन के लिए भेज रहे हैं, तभी घृणास्पद भाषणों पर रोक लगाने और उनके लिए अभियोजन चलाने से संबंधित एक और चिंताजनक खबर अख़बारों के एक हिस्से में सामने आई है। सुप्रीम कोर्ट ऑब्ज़र्वर के एक सहयोगी संपादक ने ‘द वायर’ में प्रकाशित अपनी ताज़ा रिपोर्ट में बताया है कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने घृणास्पद भाषणों पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बरती गई संयम की सलाह को याचिकाओं को बंद कर देने के एक नियम में किस तरह बदल दिया है।”
यह देखते हुए कि घृणास्पद भाषण न केवल सामाजिक वातावरण को दूषित करते हैं, बल्कि ‘दूसरों’ के ख़िलाफ़ हिंसा को भी बढ़ावा देते हैं, और यह कि सत्तारूढ़ व्यवस्था के कई प्रमुख नेताओं ने 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से पहले इसी तरह के ध्रुवीकरणकारी और घृणा फैलाने वाले भाषण दिए थे, सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय से कहा था कि वह उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के आसपास के समय में भड़काऊ भाषण देने के आरोपी राजनीतिक नेताओं के ख़िलाफ़ आपराधिक कार्रवाई की माँग करने वाली याचिका पर शीघ्र निर्णय करे—“ अनुमानतः तीन महीने की अवधि के भीतर।”
“सर्वोच्च न्यायालय के इस सुझाव के बावजूद कि मामले का निपटारा शीघ्र किया जाए, दिल्ली उच्च न्यायालय ने इसे पाँच वर्षों तक लंबित रखा। और सोमवार (5 अक्टूबर) को उच्च न्यायालय ने सात याचिकाएँ खारिज कर दीं। उसके फैसले का तर्क इन याचिकाओं के दायरे से कहीं आगे तक जाता है। यह निर्णय घृणास्पद भाषणों के मामले में संयम बरतने की सर्वोच्च न्यायालय की सलाह को रिट याचिकाओं की सुनवाई करने वाली अदालतों के लिए याचिकाएँ बंद कर देने के एक व्यावहारिक नियम में बदल देता है।”
उच्च न्यायालय ने फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा से पहले भड़काऊ भाषण देने के आरोपी राजनेताओं के ख़िलाफ़ प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश देने से इनकार कर दिया। उसने दिल्ली पुलिस के आचरण की स्वतंत्र जाँच कराने से भी इनकार किया और साक्ष्यों तथा मुआवज़े के संबंध में आगे कोई आदेश देने से भी मना कर दिया।
इसमें कोई संदेह नहीं कि “जिन छह वर्षों तक ये याचिकाएँ लंबित रहीं, वे याचिकाकर्ताओं की शिकायत को मज़बूत करने के बजाय उनके ही ख़िलाफ़ चली गईं।” यह भविष्य में न्याय की माँग करने वाले याचिकाकर्ताओं के लिए एक तरह की चेतावनी साबित हो सकती है—जब तक कि इस फैसले को एक बार फिर सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती न दी जाए, ताकि संवैधानिक अदालतों के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुरक्षित रखी गई संरक्षणात्मक भूमिका प्रभावी हो सके।
बार-बार इस बात को रेखांकित किया गया है कि घृणास्पद भाषण किस तरह ‘दूसरों’ के ख़िलाफ़ हिंसा भड़काने में भूमिका निभाते हैं और किस तरह सामाजिक तथा धार्मिक अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ आपराधिक हमले किए जाते हैं, जिन्हें अक्सर स्वतःस्फूर्त घटनाओं के रूप में पेश किया जाता है। यह एक ऐसी सच्चाई है जिसे न्यायपालिका का एक हिस्सा अब भी स्वीकार करने में विफल रहा है—और जिसके परिणाम त्रासद रहे हैं।
(जारी)
(ज़फ़रुल-इस्लाम ख़ान की किताब ‘मॉब लिंचिंग इन इंडिया : ए रिकॉर्ड 2014-2024 की पुस्तक समीक्षा का दूसरा भाग)
(सुभाष गाताड़े लेखक, वामपंथी कार्यकर्ता हैं और न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव से जुड़े हुए हैं।)